नींद,दर्द और कविता..🍁

नींद,दर्द
और कविता का,
आपसी रिश्ता
तुम्हे नही मालूम।

सूरज की तीखी
रोशनी से बचने के लिये
धूप का चश्मा लगाना
नींद है।

रंग बिरंगी हवाओं की
मार से लाल हुई
आंखों की कसक
दर्द है।

ऐसी ही खुली
आंखों में किसी का
उतर आना
कविता है।

कभी इसी

रिश्ते का
नाम रहा होगा
सूरदास।

सच मानो,
भोर से पहले
कोई मुर्गा
बांग नही देता।

जारी रहेगा
नींद ,दर्द और
कविता का शोर,
कब होगी भोर?
कब होगी भोर?

सुन समंदर…🍁🍁

राही…🍁

मन में संताप क्यों?
जीवन में उत्पात क्यों?
माना कि तेज बवंडर में
सबकुछ खो गया..
क्या जीवन यहीं
पूरा हो गया?
उद्विग्नता की घड़ी हो
परछाई दूर खडी़ हो
प्रहर बेखबर हो
प्रतीत हो रहा दोपहर
हो..
कोई साथ न चले
ऐसा भी प्रहर हो
तिरोहित हर डगर हो
विवर्धन पथ तुम बनो
बढे चलो..
प्रस्थान करो तम तिमिर लेकर
खड़ी हो घड़ी पहर सिरहाने में

हुआ तुषारबिंदु पुंज प्रकाशित
कहीं देर ना हो उठ जाने में…

🍁🍂

वैष्णवी

इंतज़ार..🍁

जाकर बहारों से कह दो
अब रंगत नहीं तुम्हारे बहार में
इक जमाना हुआ करता था
जब सदियों कट जाया करती थी
तुम्हारे इंतजार में…

दर्द में रहकर दर्द की आदत हो गई
करिश्मा है कुदरत का दर्द ही इबादत हो गई….

🍁🍂वैष्णवी🍁🍂

जिंदगी और मैं…🍂

ए जिंदगी…

ज़िंदगी की तलाश में
जो निकल पड़े हम
ज़िंदगी थी साथ
पर तलाशते रहे हम…

ए जिंदगी…

पास आते आते फिर दूर निकल जाती है
ऐ ज़िन्दगी तुझे कहां तलाश़ करूं मैं…!!

एक पल को
ज़रा रुककर
तू साँस तो ले
ज़िंदगी…
तू दौड़ रही है
हम हाँफ रहे हैं
तुझसे है..ये कैसी बंदगी है

ए जिंदगी….

जो मिला
अदना गम के साये में
गुमशुदा-सा मिला..
अपनी तरह से कोई
गमों की भीड़ में
मुस्कुराता नहीं मिला…

वैष्णवी

🍁🍂🍁🍂

आईना…🍁🍁

इस आईने का भी, अपना कभी ज़माना था।
हसीन चेहरों को सज धज के मुँह दिखाना था।

ये क्या हुआ कि वही चेहरा बन गया दुश्मन,
इस आईने से कभी जिसका दोस्ताना था ।

अजीब तन्ज था , वो तेरे हाथ का पत्थर,
इस आईने के मुकद्दर में टूट जाना था ।।

#वैष्णवी

सखे ! यह माया का देश…🍁

सखे ! यह माया का देश
क्षणिक है मेरा तेरा संग
यहां मिलता कांटों में बंधु
सजीला-सा फूलों का रंग

यहां असम्भव है चिर-सम्मेलन
न भूलो क्षणभंगुर है जीवन

नहीं रहता भवरों का आह्वान
नहीं रहता फूलों का राज्य
कोयल होती है अंतर्धान
चला ही जाता प्यारा ऋतुराज

यहां किसका अनंत यौवन ???
अरे अस्थिर छोटे-से जीवन!

खिलते हैं मुरझाने को फूल यहाँ
उदय होता अस्त होने को चाँद यहाँ
शून्य होने को है भरते मेघ यहाँ
दीप जलता होने को मंद यहाँ !!😢

मोह-मदिरा का आस्वादन
किया क्यों हे भोले जीवन ??
तुम्हें करना विच्छेद सहन
मत भूलो हे! प्यारे जीवन!!!😢😢

**वैष्णवी**